#Kavita by Gaurav gupta

अभिलाषा
पूछों इन घाट शिलाओं से,
अबला कितनी विप्रलंभ भारी,
घटा हुआ तटिनी का जल,
नहीं घटी तो वो उम्मीद मेरी,

कितने सारंग हैं विदा कियें,
कितनी ज्योत्सना देखी है,
ये उत्कंठा बस मेरी रहीं,
अरुणप्रिय रहूँ मैं तेरे संग,

मैं ताम्ररस की मृगनाभि,
तुम कल्पतरु से निष्ठुर हो,
कन्दर्प की लिप्सा रखती मैं,
तुम उमानाथ के आरसी हो,

उद्भव न हो यहां कभी,
वय कपाण सी लगती है,
रैन न रम्य हो तेरे संग,
मृत्यु ही उत्सव लगती हैं।

गौरव गुप्ता
महेश नगर,लालगंज रायबरेली।
7754828698

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