#Kavita By Gaurav Gupta

होली के रंग

फ़ागुन की धुंध में,
इस चेहरे पर गज़ल,
होली की पूर्णिमा में,
है चाँद की फ़ज़ल,

झुकीं नज़र और,
मुस्कान भरें गाल,
लगें इंतज़ार इनकों,
मेरी उँगलियाँ भरे ग़ुलाल,

इस वीरां ज़मी पे,
हो रंगों की फसल,
लाल होंठो पे करूँ,
अब रंगों की पहल,

ज़रा आहिस्ता से,
ऐ…मेरे दिल मचल,
आज होलिका दहन,
बाक़ी है बस दो पल।।

होली का ग़ुलाल

किशमिश व मुनक्का संग,
मावा में मिश्री घोली है,
पापड़ की सौंधी खुश्बू में,
हर घर में घुली होली है,

बच्चों ने निज पिचकारी में,
सत रंग की पुड़िया घोली है,
बच्चों बूढ़ों को रंगना जो,
ज़रा बुरा न मानो होली है,

उड़ता ग़ुलाल हवाओं में,
गालों में खिलती होली है,
भांग की गोली मुँह के गप,
मस्ती में घूमें होली है,

गलें मिला के गैरों को,
शिक़वे झाड़ दो चोली से,
मुस्कान भरी ये खेली है,
आ गलें लगा लूँ होली है।
होली का प्यार
दूर राह से मुड़ती,
मेरे गांव को गाड़ी,
लगता मेरे गालों का,
रंग लौट आया है,

अब होली इस रंग,
की मनाऊँ तो कैसे,
मेरा प्रेम रंग तो,
कहीं दूर खोया है,

गुझियों की किसमिस,
अब मीठी न लगतीं,
मैंने कढ़ाई से दिल का,
वो पापड़ भूना है,

क्यों मेरे हिस्सें का,
ग़ुलाल भीगा है,
क्यों इंतज़ार में रंग में,
आज सतरंग घोला है।।
गौरव गुप्ता
महेश नगर लालगंज रायबरेली।।
7754828698

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