#Kavita By Gaurav Gupta

बावरा प्रेम

ढूढ़ लेती उसकी नज़रें,
मेरे अंदर से मुझकों,
चूल्हा-चौकें में उलझी,
भुला बैठीं हूँ ख़ुदकों,

किसे याद था कि,
गर्दन पे तिल बैठा है,
आइनां निहारनें की,
अब फुर्सत है किसको,

हक़ से किसी ने,
न चाहा था मुझकों,
आज बेलन के साथ,
भेजी सेल्फी है उसकों,

जमानें की नज़र से,
छुपाया है तुझकों,
दिल की सोसाइटी में,
बसाया है तुझकों,

न चाहे पर एक दिन,
बाटना है तुझकों,
राधा रुक्मणी से कैसे,
भला बांटेगी तुझकों।।

ये दिन क्या कम थें,
जो नींदें छींन ली हमसें,
आपके प्यार की किश्तें,
नींदों से चुकाते है हम,

आसां नहीं था न,
तुमकों यूँ रोज़ देखना,
रातों के सपनें पिरों कर,
तेरी सूरत बनाते है हम

पायल की छन-छन,
खन-खन चूड़ियों की,
इन्हीं की आवाज से,
रात भर जागतें है हम।।
गौरव गुप्ता
महेश नगर,लालगंज रायबरेली।।
☎ 7754828698

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