#Kavita by Gaurav Pandey Rudr

तुम्हारे साथ माना, चल रहे हैं।

हम अपने साये को भी खल रहे हैं।।

 

मैं ख़ुद को मान लूं कैसे अकेला।

तेरी यादों के साये चल रहे हैं।।

 

मेरे क़ब्ज़े में तख़्त ओ ताज पाकर।

ये दुनिया वाले आंखें मल रहे हैं।।

 

बुज़ुर्गों से न कतराना कभी तुम।

कभी इनके महकते कल रहे हैं।।

 

चले आओ सहर के साथ तुम भी।

ये सूरज चांद तारे ढल रहे हैं।।

 

नज़र आते थे जिनकी पुतलियों में।

उन्हें ही आजकल हम खल रहे हैं।।

 

जिन्हें घेरे खड़े हो काटने को।

इन्ही शाखों पे पहले फल रहे हैं।।

गौरव पाण्डेय रुद्र

 

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