#Kavita by Gaurav Pandey Rudra

ये कैसा ज़िन्दगी का फलसफ़ा है।

जो दिल दुश्मन है वह रहबर रहा है।।

 

मेरा ईमान मुझको रात दिन अब।

न जाने क्यों बड़ा फटकारता है।।

 

नही हो ज़द में केवल तुम ही प्यारे।

हर इक इंसानी लहजा झेलता है।।

 

लगे बाज़ार हर नुक्कड़ गली में।

बहुत ख़तरे में अब मेरी अना है।।

 

निभाया साथ ग़म ने ज़िन्दगी भर।

ख़ुशी का साथ ही लगता जुदा है।।

 

जिधर देखो उधर ही ग़म का साया।

ये कैसा ज़िन्दगी का कायदा है।।

 

छुपा ले मां मुझे आँचल में अपने।

मेरा जीना यहां दुश्वार सा है।।

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