#Kavita by Gayaprasad Rajat

इस वतन की शान हूँ
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अंतःकरण में दुख समेटे बांटता मुस्कान हूँ।
हूँ चमन का बांगवा मैं इस वतन की शान हूँ।।
उठ गया विश्वास फिर भी खा रहे सौगंध जो।
पूर्व संचित पुष्प गलकर दे रहे दुर्गन्ध जो।।
हर मलिनता स्वच्छ कर दे वो सुधासम पान हूँ।
हूँ——
कुछ हवाओं ने चमन में इस तरह पतझर किया ।
कोई गर खुद ही बुझा दे जिस तरह घर का दिया।।
गुमशुदा इंसानियत के दौर का इंसान हूँ
हूँ चमन—–
है उपेक्षित क्योंकि उसका गंगाजल सा आचरण।
सत को समाहित है किये युग के असत का आवरण।।
जो बसी कान्हा के तनमन वो सुरीली तान हूँ।
हूँ चमन——
घोर रजनी के तिमिर में दीप बनकर मैं जला।
पंगुता में पवन बनकर व्योम पथ पर मैं चला।।
कोई भले राहु कहे दिनकर दिनेश समान हूँ।
हूँ चमन—-
झंझा तड़ित के साथ मे चाहे चले तूफान भी ।
खंडित न होने दें वतन आहूत हो चाहे जान भी।।
कर लूँ समाहित सब जनों को मैं वो हिंदुस्तान हूँ

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