#Kavita by Gayaprasad Rajat

सजल
समांत -अर
पदान्त-देखे हैं
मात्राभार-30

हमने जीवन मे टेढ़े मेढ़े, बहुत डगर देखे हैं।
पत्थर से ज्यादा पत्थर ,ऐसे बहुत शहर देखे हैं।

आँसू झरते झोपड़ियों से ,टप टप गिरती बूंदे ये,
कब सोयी है पलभर माँ,ऐसे बहुत पहर देखे हैं।

अपनों पर बरसाते अमृत ,औरों पर विषधारा जो,
दोहरे मानदण्ड रखें हमने भी रहबर देखे हैं।

झर झर झरते आँसू जिनके देख दुर्दशा दुनियाँ की,
बन आँसू बहती पीड़ा,ऐसे भी पत्थर देखे हैं।

प्रीति पहेली कैद हो गयी अनजाने पिंजरे में अब,
व्यंग्य सजी मुस्कानों से,हमने बहुत अधर देखे हैं।
रजत-आगरा

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