#Kavita by Gayaprasad Rajat

वर्तमान परिवेश पर एक लोकगीत
मोय लगि रही लम्बी झोल, तुम्हारी राम कहानी में।
जाय रहि है देखौ भैंस ,तुम्हारी गहरे पानी में।

सहमी सहमी पनिहारिन, ये डोल रही मारग में।
विन ग्राहक बैठे खोल दुकानें भरे भरे सारग में।
यों लगि रहियौ चाचा है गये बूढ़े भरी जबानी में।
मोय लगि रहि लम्बी झोल तुम्हारी राम कहानी में।।

मुद्दन पे मुद्दा उखड़ रहें मद्दन पे मुद्दा भारी।
वोटन की खातिर धर्म जाति की खोली , भानु पिटारी।
आश्वासन कोरे पाये ,जनता ने रस्म निभानी में।
मोय लगि रहि लम्बी झोल ,तुम्हारी राम कहानी में।।

कोई वन्देमातरम बाँटि रहियौ कोई चूरन चटनी चाट रहियौ।
कोई चोरन को सहलाय रहियौ कोई चोर चोर कहि डांट रहियौ।
सच्चन पे चलि रहे केस देखि लेउ माल औ दीवानी में।
मोय लगि रहि लम्बी झोल ,तुम्हारी राम कहानी में।

रग रग में भरौ है जहर प्रवक्ता बोलें कडुवी वानी।
जे बोलें ऐसे रोज शर्म से पड़ि रही नारि झुकानी।
कहूँ खिचरी तौ पकि रही है पर हड़िया बहुत पुरानी में।
मोय लगि रहि लम्बी झोल तुम्हारी राम कहानी में।।

मैं गांव गरीबी बात करूं तो मैं विद्रोही कवि हूँ।
यदि चारण भाटी बात करूँ तो मैं चंदा मैं रवि हूँ।
विष भरी हबायें फैली ,भारत की नीति सुहानी में।
मोय लम्बी लगी रहि झोल ,तुम्हारी राम कहानी में।।
गयाप्रसाद मौर्य रजत
आगरा
9720763101

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