#Kavita by Golu Kumar Upadhyay

“पेड़”

जीवन का आधार,

धरा का श्रृंगार,

कट रहें हैं वृक्ष,

काटे दिन जैसे,

दिन प्रतिदिन,

असंख्य!

भूला मानव,

जिसे न जन्म दिया,

न धन दिया,

फिर क्यों?

काटने पर तुला मानव!

ये हैं तो प्रकृति,

जिससे यह सृष्टि उभरती,

ये है तो श्वास है

जीने की आश है

देता माथे की शीतलता,

सहकर सारे दुख,

खड़ा रहता अविचल,

देता हमे सुख!

है निस्वार्थ,

परोपकारी,

उपकारी,

है धूप तो,

देता छांव,

न भेद, न भाव!

अरे!  मानव!

सुन  हुंकार पेड़ की,

फिर भी न काटने की प्रण की,

अब अगर जरा भी देर की,

न होगा घर न नगर,

न डगर, न कोई बस्ती,

मिट जायेगी तेरी हस्ती!

 

गोलू कुमार उपाध्याय

 

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