#Kavita by Gopal Vinod , Bareli

शाहजहाँ और ज़फर

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जिसकी तामीर हुई है उसको

एक दिन ख़ाक में मिलना है ज़रूर

ताज भी एक दिन खण्हर होगा

तब भी दुनिया में रहेगा ये मुहब्बत का सुरूर

 

ताज जैसी न हो तामीर इमारत कोई

इसी फितूर में नक्काशों के हाथ काट दिए

एक खुदगर्ज इंसां के सिरफिरेपन ने

तमाम लोग क्यों ज़िन्दा ज़मी में पाट दिए

 

उन कटे हाथों पे खड़ा दीख रहा ताजमहल

ज़िन्दा लाशों पे खड़ा दीख रहा ताजमहल

ताज को कैसे मुहब्बत की निशानी कह दूँ

ज़ुल्म की हद पे खड़ा दीख रहा ताजमहल

 

ग़र मुहब्बत का अलम हाथ में उठाया था

अनगिनत औरतें क्यों बेवा बना दीं उसने

अपनी बीवी के मकबरे के लिए

कितने खेतों में कहो आग लगा दी उसने

 

उस ज़मी को क्यों बगीचे की शक्ल दे डाली

जहाँ पे धान तबस्सुम बिखेर सकता था

जहाँ पे गेहूँ से आँखों को खुशी मिलती थी

जहाँ दलहन का कोई खेत भी हो सकता था

 

मैं मानता हूँ हसीं थी बहुत मुमताज मगर

वो खबातीन भी कम तो न खूबसूरत थीं

जिनके हाथों की परातों में भरा गारा था

जो कभी खल्क कभी दीन की ज़रूरत थीं

 

अपनी तारीख के पन्नों को बाग़ौर पढ़ो

इश्क का और भी किरदार मिलेगा तुमको

सिलसिला एक मगर फ़र्क नज़र आएगा

तब अकीदत का वह हक़दार मिलेगा तुमको

 

एक शायर था वह और शहन्शाह भी था

उसकी बीवी भी थी मुमताज मगर क्या कहिये

वतन से उसको मुहब्बत थी बेपनाह लेकिन

छिन गया उसका तख़्त-ओ-ताज मगर क्या कहिये

 

उसने आज़ाद फिज़ाओं के ख्वाब देखे थे

उसे आज़ाद हवाओं का इंतजार रहा

उसको बेटों के सिर परोसे गए

आखिरी साँस तक उसको वतन से प्यार रहा

 

उम्र भर ज़ुल्म सहे और ग़म उठाए थे

उस शहन्शाह को मिला क़ैदखाने का सफर

यह वतन आज भी उसको सलाम करता है

वह बहादुर था, बहादुर था, बहादुर था ज़फर

 

वतन के वास्ते मरने से पेश्तर सोचो

वतन के वास्ते जीना बहुत ज़रूरी है

वतन से इश्क को आला मकाम मिलता है

इश्क-ए-महबूब फक़त उम्र की मजबूरी है

 

इसलिए तुमसे गुजारिश है मिरे हमअस्रो !

तुमको तारीख के पन्नों को समझना होगा

शाहजहाँ और ज़फर दोनों में

इश्क के वास्ते बस एक को चुनना होगा

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