# Kavita by Govind Barhath Charan

राहगीर
(१)
मै दूर राहो का राहगीर।होऊ मंजिल पाने विकल अधीर
मै कैसे चलूं चोटो से कदम डगमगाता है।
दौर निरन्तर बढता जाता है।।
(२)
मै इच्छुक आकाशी ऊंचाई पाने को
पर परो मे वेग कहा इतना बढ जाने को
मै प्रत्याशा मे बैठा संकट कब कट पाता है।
दौर निरन्तर बढता जाता है।।
(३)
मै स्वर्णिम मंजिलो का उल्लासी
पर अभी तक मेरी चाह प्यासी
क्योकि मेरा मन खतरो से डर रुक जाता है।
दौर निरन्तर बढता जाता है।।
कुं. गोविन्द चारण-

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