#Kavita by Govind Charan

ये बेमौसम  मुझको  खिलना  नही  आता।
तुमसे मिलना चाहता हूं मिलना नही आता।।

हरेक लब्ज ही के पीछे तूम्हे खोजे कौन।
मुझे तूम्हारे इश्क मे यूं पलना नही आता।।

तू जो है मुझ मे मुकम्मल शामिल हो जा
मुझे तुझ से आगे निकलना नही आता।।

इश्क करे तो किससे कोई तो मिले यारो।
ये रोज रोज मुझे घर बदलना नही आता।।

आंसू तो तूम्हारे जिन्दा होने का प्रमाण है।
मुर्दो मे कभी इन्हे छलकना नही आता।।

वो जो सूख गए है बेवजह पाताल तलक।
कह भी दो उन्हे कभी जलना नही आता।।

जिनकी यादो से पतझड़ मे जी रहे आंशिक।
क्या आशिको का सावन सुहाना नही आता।।

✍कुं गोविन्द चारण “झणकली”

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