#Kavita by Gyanendra Shukla

बचपन का स्कूल बिना प्रमाणपत्र के चलता था,

गली-गली में रोज शोरगुल होता था।

रोज शिकवे और शिकायतों का दौर चलता था,

शाम सुबेरे,जेठ दुपहरी गर्मी भी लजाती थी।

एक खेल ताश पत्तों का भी होता था,

डंडी वाली बर्फ और कुल्फी का अलग मजा होता था।

बचपन का कोई प्रमाणपत्र नही होता था,

नानी और दादी के घर जाने का एक बहाना होता था,

कब छूटे स्कूल और हम आएं घर,

माँ की नज़र बचाने का कोई तरीका होता था।

शाम और रात का कोई फर्क नहीं पड़ता था,

बस्ते में हमारे बचपन का कोई प्रमाणपत्र नही होता था।।

—-@#ज्ञानेन्द्र

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