#Kavita by Harprasad Pushpak

कविता
मई जून का महीना
चिलचिलाती धूप
हार नही मानी
संघर्ष की ठानी
सूर्य देव.दिखा रहे
अपना रौद्र रूप
थुल-थुल मोटी काली काया
बिखरे बाल
जीवन वेहाल
पसीना ही पसीना
कैसा आया यह
मई जून का महीना

सड़क के किनारे
पेड़ के सहारे
आधी धूप आधी छाया
बेचती पंखे
हर आने जाने बाले को
निहार रही थी
बाबू जी
ले लो न!
वहुत काम आयेगा
गरमी में यही
साथ निभायेगा
गरमी में सिर्फ हवा
यही है
हर मर्ज की
एक ही दवा
राहगीर झुका
पंखा उठाया
मौल भाव किया
नही भाया
चला गया

बच्ची मां के सीने से लिपटी
अठखेलियां कर रही थी
मां के बाल खींच
दूध पीने पर
अड़ रही थी
मां कभी झिड़कती
कभी दुलार रही थी
फिर
कंधे से लगा थपथपाया
अपनी भाषा में
कुछ गाया
बच्ची भूखी ही सो गयी
मां की आत्मा रो गयी
कितना मुश्किल है जीना
कैसा यह
मई जून का महीना
तपती धूप
अंगारे बरसा रही है
खेतें में डटा किसान
ठेला खींचता मजदूर
सीमा रक्षा में
निष्ठा से समर्पित जवान
हार नही मानी
संघर्ष की ठानी
हौंसले में वही जुनून
कैसा महीना मई जून
सीमा प्रहरी/श्रमिक /किसान
तपापूत धरती पुत्र
तुम हो महान
तुम्हे नमन्
तुम्हे प्रणाम
जय जवान जय किसान

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