#Kavita ( Hindi Diwas ) by Dr. Raghvendra Mishra Pandey

अपने ही घर में मेरा अपमान हो रहा है
अँग्रेजियत के हाथों बलिदान हो रहा है।

गूँगा है राष्ट्र वह ही जिसकी न कोई भाषा
यह देश डूबता – सा जलयान हो रहा है।

हिन्दी की हिन्द में अब सूरत जो आजकल है
लगता है अपने देश का संविधान रो रहा है।

वर्षों से सँभाली थी हिन्दी की जिसने थाती
कबिरा भी रो रहा है, रसखान रो रहा है।

-डॉ०राघवेन्द्र मिश्र ‘प्रणय’

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