#Kavita by Ishq Sharma

हे विरही मेघ!!

 

तड़प ज़मीं की, प्यास ज़मीं की,

आस ज़मीं की, कौन बुझाए..

चीर चीर के बादलों को,

घिर घिर के बादलों संग,

हे विरही मेघ! तू जल्द आजाये..

 

बदली बनकर बादल सारे,

आते रहते जाते रहते,

रफ़्तार इनकी घोड़ो सी,

बचपन से घुड़पूंछ कहलाते,

कभी न थकते चलते खूब,

दिनवा रतिया साँझ सकारे,

हे विरही मेघ! तू जल्द आजाये..

 

कहाँ रुकी तू, कहाँ है ठहरी,

क्यूँ बन बैठी, मेरी बैरी,

बरस जा उमड़-घुमड़ के तू,

कान खोल के सुन ले बहरी..

हे विरही मेघ! तू जल्द आजाये..

 

विरह से तेरी प्रसन्न होगा,

धरती आँगन हर तन मन,

गिरेगा लहु सा अश्रु जो,

उपजेगा हर वन में धन,

किस राग में, किस धुन में,

कौन जाने तू कहाँ जाये..

हे विरही मेघ! तू जल्द आजाये..

 

© इश्क़शर्माप्यारसे✍📲9827237387

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