#Kavita by Ishq Sharma

  • ••••••••••••••••• माँ ••••••••••••••••••

वो रग-रग से गुफ़्तगू किया करती थी।

माँ मुझको कुछ यूँ जिया करती थी।

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बिन दाँतोंके मैं,क्या-क्या खा पाऊँगा।

माँ बाज़ार से वही लिया करती थी।

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सर्द गर्म हो या बरसात का मौसम।

आँचल में मुझे पनाह दिया करतीथी।

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अपने लाड प्यार से मुझे खुश कर के।

मेरी खुशीमें खुश हो लिया करती थी।

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कितनों भी थकी-हारी रही फिर भी।

ज़िद आगे मेरी झुक लिया करती थी।

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परियों की कहानी,कभी लोरी सुहानी

माँ मुझे सुलाने गा लिया करती थी।

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खुशमिजाजी माँ मेरे मतलब की थी।

बे’मतलब भी स्नेह दिया करती थी।

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पलकों में बिठाती,आँचल में छिपाती

रूठके भी मुझे मना लिया करती थी।

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मेरी हथेलियों में अपनी उंगली फसा।

चलनेको माँ यूँ सहारा दिया करतीथी।

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लड़खड़ाते जब कभी मैं गिर जाता।

माँ ज़मीं में चींटी मार दिया करती थी।

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पुचकार कर फिर उठाती माँ मुझे।

गोदी में झूला-झुला दिया करती थी।

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जब भी इतराता मैं गोद में उसकी।

माँ माथे को मेरे चूम लिया करती थी।

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मेरे बचपन में अपना बचपना ढूँढती।

माँ सीने से लगाके रो दिया करती थी।

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तुतलाते हुए मैं पूछता क्या हुआ माँ?

पल में हसीं समा बना लिया करती थी।

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ख़ुदा की रहमत सारी इनायत उसिपे।

न्यौछावर माँ मुझपे किया करती थी।

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किस्मती लकीरें ख़ुदा ने बक्शी भले।

उन्नति की दुआ माँ किया करती थी।

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© इश्क़शर्माप्यारसे✍📲9827237387

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