#Kavita by Ishq Sharma

एकपैग़ाममाँकेनाम

 

सीने से लगा लेती है,

आँचल में छुपा लेती है,

पुचकारती बे’वक़्त मुझे,

दुनिया मुझमें बसा लेती है,

अधिकार है औरों से पहले,

मुझमें उसके सपने सुनहले,

ख़ुद में मुझे यूँ पनाह देती है,

दुनिया मुझमें बसा लेती है,

मैं  बेख़बर  कैसे  हो  जाऊ,

औरों के दर क्यू ठोकरें खाऊ,

मेरे दर्द को अपना बना लेती है,

माँ दुनिया मुझमें बसा लेती है,

औरों  में  उपरोक्त  बात नही है,

किसी  की  ऐसी  जात  नही  है,

मेरी  ख़ुशी  में  खुश  हो लेती है,

माँ दुनिया  मुझमें  बसा  लेती है,

 

© इश्क़ शर्मा प्यार से ✍

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