#Kavita by Ishq Sharma

मजदूर या मजबूर
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
वो रोज कमाता रोज खाता
शान ओ शौकत नही दिखाता
अपना हो या कोई पराया
अपनी गरीबी नही बताता
बंज़र कितनी भी हो धरा
लहु सींच उपजाऊ बनाता
मंशा अनेक है उसके भी
पीड़ा अपनी नही दिखाता
भेष बदल कर आते मौसम
हर मौसम कुछ’न’कुछ उगाता
मजदूरी , मजबूरी न मानो
ये न होता अन्न कहाँ से आता
दिहाड़ी मजबूरी है उनकी
कौन सेठ परमानेंट बिठाता
शहरों में गिध्द बहुत है बैठे
कौड़ियों में जो चुनना चाहता
मद ऐश ओ आराम दिखा के
मेहनत मजदूरी गिराता जाता
दिहाड़ी उतनी मिलती नही
जितने में खुद मैं पल पाता
जो तू न होता मैं क्यों कमाता
हाय रे पेट तू अलग हो जाता
सरकारें क़र्ज़ बहुत देती हैं
दलालियों में खत्म हो जाता
मेहनत जैसी मजदूरी मिलती
क़र्ज़ मैं भी अदा कर पाता
संकट में कभी पड़ता नही
न फंदे में लटकना आता

144 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *