#Kavita by Ishwar Dayal Jaiswal

* जीवन की अनुभूति *

 

जब मैं सोचता हूँ !

केवल अपने लिए ,

परिवार के लिए ,

तब !

हर कर्म करता हूँ ,

फिर भी

नही मिलती मन को तृप्ति ,

नही मिलता आत्मिक सुख ,

जीवन की अंतिम बेला तक

नही मिलता शारीरिक विश्राम ,

शेष रह जाती है –

आखिरी सांस तक

सांसारिक खुशियों की कसक ,

मृग मारीचिका की तरह ।

×××××÷×××××÷×××××÷××××××××÷×××

 

जब मैं सोचता हूँ !

अपने से इतर

पड़ोसी के लिए ,

समाज के लिए ,

संसार के लिए ,

तब !

अधूरे मन से ही सही ,

जो कुछ भी

आधा- अधूरा कर्म करता हूँ ,

पता नही क्यों और कैसे ?

पूर्णता का आभास करता हूँ।

कुछ अधिक पाने की

रहती नही लालसा ,

और न ही

प्रतिकार की अभिलाषा ।

×××××××÷×××××××÷××××××÷××××××

 

जब मैं सोचता हूँ !

यदा – कदा

मैं हूँ कौन ?

क्यों है मेरा अस्तित्व ?

उत्तर खोजता हूँ ,

स्वयं को तलाशता हूँ –

अपने ही अंतस में ,

तब !

हो जाता हूँ –

व्यग्र ;

मेरा अस्तित्व है ही कहाँ ?

जब दूसरों के अंतस में

झांकता हूँ ,

अपनी तरह

उनको भी पाता हूँ ।

फिर क्यों कामना करता हूँ ?

सांसारिक सुखों की !

क्यों लालसा करता हूँ ?

शारीरिक सौंदर्य की !

इन्हीं प्रश्न और उत्तरों के बीच

मुक्ति की कामना करता हूँ –

आदि से अनन्त तक ।

 

~~ईश्वर दयाल जायसवाल ;

टांडा – अंबेडकर नगर ( उ.प्र. ) ।

 

138 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *