#Kavita by Ishwar Dayal Jaiswal

समर्पण
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निखरी , खिली – खिली, धूप
स्वच्छ आकाश में
कलरव करती- चहचहाती
चिड़ियों की मधुर गीत- संगीत,
खेतों में खिले दूर- दूर तक
लाल- पीले सुकोमल फूलों की पंखुड़ियां,
मंडराती रंग- बिरंगी तितलियां ,
प्रफुल्लित करती हैं
जीवन भर के कसैले मन को ।
लेकिन !
चलना पड़ता है–
शीशे जैसी चिकनी – चमकती
सड़कों से उतर कर
धूल – धूसरित पगडंडियों ,
उबड़-खाबड़ मेड़ों पर ।
और
प्यास बुझाने के लिए
दोनों हथेलियों को चूल्लू बनाकर
पसारना पड़ता है–
नि:स्वार्थ , निर्विकार , ” गागर ” के सामने ।

—— ईश्वर दयाल जायसवाल ,
टांडा– अंबेडकर नगर (उ.प्र.)
[ मोबाइल- ९३०७७१८७८९ ]

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