#Kavita by Ishwar Dayal Jaiswal

 

** अंतहीन शाश्वत   ***

 

शाश्वत !

तुम कहाँ हो ?

तुम्हे खोजता रहा

अतीत मे ,

खोजता रहूँगा

अनन्त भविष्य मे ,

वर्तमान मे हो अदृश्य तुम ।

शाश्वत !                                     तुम कौन हो ?

तुम्ही से बँधा है संसार ,

तुम्हीं से गुंथा है ब्रह्मांड ,

तुम्ही करते हो सबका उत्थान,

और करोगे सबका अवसान ।

शाश्वत !

तुम क्या हो ?

हे अनन्त अविनाशी !

मैं तो चला हूँ –                            इसी सृष्टि से ,

सदा रहता हूँ –                        तुम्हारी दृष्टि में ,

फिर भी !

भटकता हूँ ,

तड़पता हूँ ,

और तरसता हूँ ,

तुम्हारा सानिध्य पाने को ।

मै हूँ भी कितना अज्ञानी ?

और हूँ कितना अशक्त ?

न तुम्हे देख सकता हूँ ,

न तुम्हे छू सकता हूँ ,

और न अहसास कर पाता हूँ ,

बस खोया रहता हूँ-

सोचता रहता हूँ-

‘ तुम्हारे ‘                                अंतहीन कल्पना में ।

 

— ईश्वर दयाल जायसवाल ;

टांडा- अंबेडकर नगर (उ.प्र.)  ।

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