#Kavita by Jasvant Khatik

बाल दिवस
बच्चे होते है मन के सच्चे
गंगा सा पवित्र होता है मन
फिर से जीने का मन करता
कोई तो लौटा दे वो बचपन
सुबह सवेरे सब स्कूल जाते
साथ में बैठ के टिफिन खाते
पलभर के होते लड़ाई-झगड़े
फिरसे हम सब एक हो जाते
मिलझुलकर सारे खेल खेलते
कभी हारते और कभी जीतते
भेदभाव जाति धर्म मिटा कर
हंसते -खेलते  वो दिन बीतते
कक्षा कक्ष में खूब मस्ती करते
कागज के हवाई जहाज उड़ते
चाहे हमेशा गुरुजी डंडे मारते
पर वो रिश्ते बड़े मजबूत जुड़ते
सजा एक को मिल जाती तो
दोस्त भी साथ में सजा काटते
साथ में मुर्गा बनने का मजा
और प्यारा सा अहसास बाँटते
गिल्ली डंडा और कंचे खेलते
छुपन छुपाई देर रात खेलते
सच्चे मन और यारी दोस्ती से
एक दूजे का दुख सुख झेलते
अब वो प्यारा बचपन नही रहा
डिजिटलयुग ने बचपन खा लिया
मोबाइल खा गया खेल खिलौने
कंप्यूटर ने सारा प्यार  खा लिया
बाल बच्चों की सेवा करता और
उनकी खुशियों के लिये  जीता है
बच्चों संग बच्चा बन जाता “जसवंत”
जीवन का असली रस वो पीता है
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
कवि जसवंत लाल खटीक s/o लालूराम खटीक
गाँव – रतना का गुड़ा , पोस्ट – ननाणा ,
तहसील – देवगढ़ , जिला – राजसमंद
( राजस्थान )
पिन कोड – 313332
8505053291

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