#Kavita By Jasveer Singh Haldhar

गीतिका -होली में
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रंग नया है रूप नया है बात पुरानी होली में।
बाहर बाहर रंग भरे है भीतर पानी होली में ।

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई एक साथ होली खेलें,
तीन रंग का घोल बनाया हिंदुस्तानी होली में ।

केसर घाटी सुलग रही है पिछले सत्तर सालों से ,
पुलवामा विस्फोट खा गया कई जवानी होली में ।

मांथे का सिंदूर मिट गया जाने कितनी बहनों का ,
उनके घर मातम पसरा है करुण कहानी होली में ।

निर्वाचन के महापर्व पर गधों गधों में टक्कर है ,
घोड़े घास चवाते देखो अनपढ़ ज्ञानी होली में ।

देश प्रेम का फ़ाग नही है कुर्सी का है राग यहां ,
माया ममता ने ठोकी है ताल सुहानी होली में ।

ये हलचल ये कोलाहल सब पैसे वालों की माया ,
जिस पर जितना पैसा उतनी चादर तानी होली में ।

दुश्मन की धरती पर जाकर हमने बीन बजाई है ,
नाग तीन सौ बिल में मारे पाकिस्तानी होली में ।

रंग गुलाल लगा “हलधर”ने मुखड़ा दर्पण में देखा,
तेरी मेरी इसकी उसकी एक निशानी होली में ।।

हलधर –9897346173

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