#Kavita by Jasveer Singh Haldhar

कविता -पग कहीं चकरा गया है

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आज देखो भारती का पग कहीं चकरा गया है !

आदमी की आँख में जाला कहीं पथरा गया है !

रोग से वो ग्रस्त देखे थे कभी संग्राम जेता ,

भाल सूरज सा लगे था विश्व ने माने विजेता ,

भंग सारा वेद दावा दंग है चेतन्य आभा ,

भीष्म के हस्ताक्षरों पर कोहरा सा छा गया है !1

दे रहीं हैं रोज सीता आग के सम्मुख परीक्षा ,

जातियों के आवरण में राह भटकी वेद दीक्षा ,

देख कर मुर्दे हँसे हैं राम तम्बू में फसे हैं ,

बीज झगड़े का जमीं में बाबरा फैला गया है !2

भोज पात्रों में महकती गंध नकली इतर वाली ,

आदमी के भाष में भी रम गयी हैं खास गाली ,

मूक वेदों की ऋचायेँ मूक हैं आराधनायें ,

देवता से छीन थाली भोग दानव खा गया है !3

रोज अखवारें सुनाती रक्त रंजन की कथायेँ ,

मृत्यु के आलेख अंकित कर रही कौमी सभायेँ,

मंच पर दागी खड़े हैं चोर डेरों में पड़े हैं ,

छोड़ के हल बैल”हलधर”सत्य लिखने आ गया है !4

हलधर -9897346173

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