#Kavita by Jasveer Singh Haldhar

गीत -जहां का दर्द मेरे साथ में है

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धरा आकाश जैसी प्रीत हूँ मैं ,

जहां का दर्द मेरे साथ में है !

अहं पर ब्रह्म जैसी जीत हूँ मैं ,

उसी का लेख मेरे माथ में है !

फिसलती रेशमी शब्दावली का ,

नहीं पहने हुए मैं आवरण हूँ !

मुझे आता न भाषा का सलीका ,

पता हूँ गाँव का शहरी वरण हूँ !

न पिछड़ी रूढ़ियों की रीत हूँ मैं ,

समूचा देश मेरे हाथ में है !

धरा आकाश जैसी प्रीत हूँ मैं ,

जहां का दर्द मेरे साथ में है !!1

सकल ब्रह्मांड का मैं नागरिक हूँ ,

न केवल गाँव का ना ही शहर का !

मरुस्थल का सगा हूँ जागरुख हूँ ,

सगा हूँ सिंधु का ऊंचे शिखर का !

न दिल्ली राज पथ का गीत हूँ मैं ,

बसी ये जान तो फुट पाथ  में है !

धरा आकाश जैसी प्रीत हूँ मैं ,

जहां का दर्द मेरे साथ में है !!2

सतत गतिमान पिंडाकार हूँ मैं ,

गतागत लोभ लालच में सना हूँ !

जमीं पर शून्य का विस्तार हूँ मैं ,

चरा चर पंच तत्वों से बना हूँ !

उसी का दास उसका मीत हूँ मैं ,

सनातन सत्य जग के नाथ में है !

धरा आकाश जैसी प्रीत हूँ मैं ,

जहां का दर्द मेरे साथ में है !!3

सदा जोखिम भरा जीवन जिया हूँ ,

किये है भोग पीड़ित कर्म सारे !

कभी पीछे न देखा विष पिया हूँ ,

चला हूँ योग साधन के सहारे !

नया “हलधर “रचा संगीत हूँ मैं ,

ऋचायेँ वेद मेरी प्राथ में है !

धरा आकाश जैसी प्रीत हूँ मैं ,

जहां का दर्द मेरे साथ में है !!4

हलधर -9897346173

 

 

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