#Kavita by Jasveer Singh Haldhar

लावारिस

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मैं  हूँ  लावारिस  क्या  मेरा , पैदा  होना  या  मर  जाना ।

सड़कों पर जीवन बीतेगा , ना  मुझे किसी के घर जाना ।।

नहीं कोई ऋतु वसंत यहाँ ,सर पर है नभ की छत नीली ।

अंतड़िया भूखी सिकुड़ गयी ,आँखों की पुतली है पीली ।।

ना जानू मैं क्यों आया हूँ , है कौन मुझे लाने  वाला ।

आँधी से लोरी सुनता हूँ ,लगती सूखी सी या गीली ।।

कूड़े करकट के ढेर  मुझे , अपनी गोदी  में लेते  है ।

रह रह कर मुझे डराता है ,काली रातों का वीराना ।।1।।

कोई आया कुछ खिला गया ,कोई आया कुछ पिला गया ।

कुत्तों का टोला मरने की  ,सीमा तक  मुझको रुला गया ।।

सारी ऋतुएँ दुश्मन मेरी ,ना मित्र कोई बनकर आती ।

जब मिला निबाला नींद लगी ,जब भूख लगी कुलमुला गया ।।

लावारिस मुझको ना मानो ,लावारिस है लाने वाले ।

जो धरा गोद में छोड़ गये ,आया ना जिनको अपनाना ।।2।।

यदि मैं भी चाहूँ मुस्काना, तो  मेरा  क्या  है दोष  बता ।

मुझको तो उनसे मिलना है ,वो पापी जो कर गये खता ।।

तन कहता है दुनियाँ में हूँ ,पर मन को शंका होती है ।

मन की पीड़ा तब कम होगी,मुझको भी थोड़ा प्यार जता ।

सुख सेज भाग्य में होती तो ,आता मैं बड़े घराने में ।

पैदा होते ही  “हलधर “मैं ,लोगों में जाता पहचाना ।।3।।

हलधर -9897346173

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