#Kavita by Jayati Jain Nutan

कविता – शील बचाने उठ अब नारी ।

 

चल उठ स्त्री बांध कफन अब

कोई रक्षक नहीं आयेगा

हत्या शोषण बलात्कार से अब

कोई तुझे नहीं बचायेगा ।

 

ये कलयुग है निर्ममता यहाँ

स्नेह की आस किस्से लगाओगी ?

स्तन पर नजरें टिकाये बैठे

दुशासन से ना बच पाओगी ।

 

कैसी आस लगा रखी है तुमने

जिस्म के ठेकेदारों से ?

खुद की रक्षा खुद के सिर है

शस्त्र कब तक ना उठाओगी ?

 

सदियों से उपभोग की वस्तु

स्वयं को कितना सताओगी ?

शील बचाने खड़क उठालो

कब तक बेचारी कहलाओगी ?

 

वस्त्र कोई खींचेगा तुम्हारा

तुमपर मर्दानिगी दिखायेगा

ऐसे बलात्कारियों को तुम

कब नामर्द नपुंसक बनाओगी ?

 

छोड़ संताप उठजा अब भोग्या

कोई नहीं बचाने अब आयेगा

नूतन आगाज़ के साथ करो सामना

मौन ईश्वर भी सर झुकायेगा !

— जयति जैन ‘नूतन’

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