#Kavita by Jitendra Yadav

एक तूफ़ान उस दिन भी आया था

जब तुम्हारा दुपट्टा उड़ा था और

हमारे जज्बातों का पेड़ उखड़ गया था।

 

तुम धूल उड़ाती हुई आगे निकल गयी

हम आँख मलते रह गए थे और

इस तरह मैं खुद से हीं बिछड़ गया था।

 

पल में अरमानों का महल खड़ा हुआ था

जो अगले पल जमींदोज हो गया और

मैं खड़ा-खड़ा हीं जमीं में गड़ गया था।

 

लेकिन मैं उस तूफ़ान में भी सुरक्षित निकल गया

आँधियों को रुख मोड़ना पड़ा था अपना

क्योंकि उसका पाला जो हमसे पड़ गया था।

 

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