#Kavita by Jyoti Mishra

गर्मी

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गर्मी आते ही

याद  आ जाती है

बचपन की ढेर सारी यादें ..

गर्मी की छुट्टियां ..जैसे

मिल गई हों

मुहमांगी मुरादें  …

 

बहुत बड़ा संयुक्त परिवार

बुआ , चाचा- चाची की डांट -डपट

भरपूर प्यार ..दुलार

 

ढेर सारे छोटे -बड़े, भाई -बहन

एक ही रसोई में जमीन पर बैठकर

हंसते -खाते

बड़ा सा आंगन …

 

भरी दोपहरी चुपके से

बगीचे में भाग जाते

जलते पैर ..लू के थपेडों में

खट्टी इमली ..अंबिया खाते

 

लहू -लुहान भले हो जाएं

कांटों से हाथ पैर

तोड़ने को व्याकुल

जामुन आम और बेर

 

पेड़ों से  गिरते -चढते

एक -दूसरे को थामे

साथ नहीं छोड़ते …

 

शाम को घर  आएं ऐसे

जैसे लांघ कर  आएं हों पहाड़ -पर्वत

कड़वी डांट के साथ मिलता

बेल का मीठा शर्बत ..

 

या फिर

पी लो

आम का पना

कहां मिलता है अब वो

भूना चना …

 

रात को छत पर

शीतल ,धवल चांदनी का बिछौना

बनते -बिगड़ते बादलों के आकार से

बढ़कर नहीं था

कोई खिलौना ….

 

तारों को गिनने की शर्त लगाते

आस – पास लेटे सारे

दुनियां भर की

बातें बतियाते ….

 

रामायण -महाभारत के किस्से कहानी

टी  .वी .नहीं था

पर याद थे मुंहजबानी…

 

साथ चंपा -चमेली,

रातरानी की खुश्बू लपेटे

बीत जाती थीं रातें

पीढियों की थाती समेटे ..

 

बस मां -बाप की ही फिक्र

नहीं थे हम बच्चे

भाई -बहन , चाचा -बाबा

जब  साथ रहते

 

अब मां -बाप को ही खबर

नहीं बच्चों की होती

कब, कहां, कैसे हैं

उनके लाड़ले बेटे -बेटी …

 

मोबाइल , फोन पर ही

होती हैं सारी बातें

न ऑखों में नींद है

न कटती हैं रातें ..

 

है डनलप के गद्दे , चले कूलर,  ए. सी.

नहीं चैन वैसा

न ही ठंढक है वैसी ..

है रिश्तों में भी अब

कहां वैसी गर्मी

न वो इज्ज़त , बडप्पन

न हीं बातों में नरमी ….!!

 

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