#Kavita by Jyoti Mishra

“अंतर्मन”

 

अंतर्मन में  गहन वेदना

गीत खुशी के गाता हूं

दीप जले  ज्यों नीचे तम है

आलोकित हो जाता हूं….

 

विचलित मन,उद्विग्न हृदय है

जीवन डगर ,कंटीली है

पर सांसों की डोर थमे न

जिद्दी बड़ी हठीली है

पीकर अंतस की पीड़ा को

खिल गुलाब मुस्काता हूं

 

अंतर्मन में गहन वेदना

गीत खुशी के गाता हूं ….

 

प्राची ने ओढी है लाली

भूली कल की रात थी काली

छुपा अंधेरा जलता सूरज

बनूं उजाला लाता हूं ..

 

अंतर्मन में गहन वेदना

गीत खुशी के गाता हूं …..

 

मन में मेरे घाव भरे हों

पैर में चाहे छाले हों

भूख प्यास सब सह जाऊं मैं

बस दो चार निवाले हों

बना समंदर समा लूं सबके

दुख मैं सब हर जाता हूं

 

अंतर्मन में गहन वेदना

गीत खुशी के गाता हूं …..

 

दया करो तुम दयानिधि मुझपे

भाव कभी न कम जाए

सूखे नहीं दर्द की स्याही

कलम कहीं  न थम जाए

शब्द -शब्द मैं खेला करता

दिल  अपना बहलाता हूँ …..

 

अंतर्मन में गहन वेदना

गीत खुशी के गाता हूं …….!

 

ज्योति मिश्रा🔥

पटना

One thought on “#Kavita by Jyoti Mishra

  • November 21, 2017 at 7:34 am
    Permalink

    हार्दिक शुभकामनाये
    बहुत ही सुंदर गीत लिखा आपने

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