#Kavita by Jyoti Mishra

बेटी के मन के उद्गार

 

अपने हृदय के टुकड़े को, और किसी को देते हो

बेटी को ससुराल भेजकर, बाबुल तुम भी रोते हो

 

बाहों में तेरी झूली थी,  चढी पीठ पर खेली थी

महलों का आनंद भरा था  , टूटा भवन हवेली थी

 

थोड़ी मुझको चोट लगे तो  ,घंटो तुम सहलाते थे

हमें देखने जाग -जागकर , रातों को उठ  आते थे

 

कभी चहकती चिड़िया बनकर  ,मन तेरा बहलाती थी

कभी तुम्हारी मां बन जाती, मैं जब तुझे खिलाती थी

 

किससे अब मैं जिद्द करूंगी, कौन कहे गुड़िया मेरी

भूखी प्यासी, भूख मिटाये ,  अब सबकी बिटिया तेरी

 

मुझको तुम ससुराल भेजकर, जग की रीत निभाते हो

पर जब कोई मुझे सताये, गहन वेदना पाते हो

 

कहकर मुझे पराये घर की, दूर कभी नहि तुम जाना

पहले सा अधिकार समझकर,  भला बुरा समझा आना

 

तेरा मान न कम होने दूं, ऐसा तुम विश्वास धरो

दोनों कुल की लाज धरूंगी , मरते दम तक  आस करो

ज्योति मिश्रा🔥  –  पटना

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