#Kavita by Jyoti Mishra

घरौंदा

 

 

बचपन में बनाया करते थे

हमसब

सपनों  का घरौंदा …

मिट्टी की खुश्बू से तर

भावनाओं से महकता

सोंधा -सोंधा….

निश्छल, निर्मल प्यार की अटूट दीवारें

सबको  छाया देने वाली छत ..

ओसारा…ऑगन

अपनेपन से ओत -प्रोत

कोना -कोना ….

कच्चा …अधपक्का सा

पर कितना सादा …सुन्दर

सच्चा सा ….

दादा -दादी, चाचा -चाची

बुआ ..दीदी , भईया

सबके लिए होती थी जगह

सबके बच्चे  लाड़ले जैसे

कृष्ण कन्हैया ….

घर  -ऑगन फूलों से सजाते

मनचाहे रंग भरते

हंसते …गाते …

जैसे -जैसे हम बड़े होते गए

समझदारी से अकड़ते

कड़े होते गए ….

घर की जगह सीमेंट के मजबूत

मकान बनाने लगे

हम की जगह

मैं कहलाने लगे ….

न घर में स्नेह का पौधा लगाया

न कोमलता की रखी जगह

रिश्ते निभाने लगे

दस्तूर की तरह …

खुली हवा, धूप, पेड़ की शीतल छांव छोड़

गांव से दूर शहर में

बसने लगे …

घरौंदे जैसा सबको अपना लेने वाला

घर .. अब कहां

मेहमानों की होती नहीं जगह

घर वाले भी सानिध्य को

तरसने लगे ….! ज्योति मिश्रा 🔥

 

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