#Kavita By Kamlesh Joshi

कंपकपाकर जाती शीत का अंत लिखुं
या महकता आता मुस्काता बसंत लिखुं

निकल आए बाहर कलियों से हंसते हुए
उन फूलों के मुस्काते चेहरे का रंग लिखुं

चले घूमने देखों कितने प्रसन्नचित युगल
जीवजगत बसंतमय सारा मनपतंग लिखुं

उठा कलम रचते कवि कितने काव्य नये
कोई तुलिका से रंगता, अंबर नवरंग लिखुं

पावन दिवस मां सरस्वती वीणापाणि का
पुत्र मैं चरण में उनके शतशत नमन लिखुं

कमलेश जोशी
कांकरोली राजसमंद

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