#Kavita by Kanchan Sahu Kritika

अंधभक्ति का दीप जलाकर बैठे हैं दरबारों में

देखो कैसे होड़ लगे हैं धर्म के ठेकेदारों में

 

राम नाम की आड़ ले करते खुद को सिद्ध

कृत्य जो इनका देख ले तो शरमा जाये गिद्ध

 

धधक रही वासना की ज्वाल जो बुझा न पाये

फेर राम नाम माला सन्त वेश हैं बनाये

 

धर्मदूत बनकर सदा कर रहे धर्म का नाश

बहुमुखी प्रतिभा के धनी पर कैसे हो विश्वास

 

स्वघोषित देवता बन अपना रहे अधर्म को

सुमिर राम का नाम बताते भक्ति के मर्म को

 

संस्कार और मर्यादा की हैं धज्जी उड़ा रहे

नन्ही कोमल पंखुडियों से सेजों को सजा रहे

 

ऐसे बाबाओं के बातों में हम उलझ रहे

है नही इंसान जो उनको भगवान समझ रहे

कंचन कृतिका

Leave a Reply

Your email address will not be published.