# Kavita By Kapil Jain

दिन प्रतिदिन

कुछ न कुछ लिखता हूं

शब्दों के विविध रूप

मस्तिष्क चाक पर गढ़ता हूं

रगं-रूप-गंध कलम से

गन्तव्य-पथ पर आगे बढ़ता

जीने की नव-प्रक्रिया के साथ जुड़ता हूं

कलम से होती

आत्मीयता की सघन्ता पुष्ट

भले ही होते हों

सपनों के चित्रित स्वरूप रुष्ठ

इस तंग दुनियादारी की

विचित्र रूप कथाओं के

अपरूप सौन्दर्य प्रभाव में आकर

बार-बार अपने रास्ते से मुड़ता हूं

कलम की नोक से

जन्मों का यही

प्राणान्तरण करता हु

यह सच है कि जैसा है नहीं

वैसा दिखता भी नहीं

और जैसा दिखता है

वैसा है नहीं

अनन्त समय कागज पट पर

अहसास होता

जिसे बार-बार मुट्ठी में भरता हूं

प्राण संवेदना के

कोरे कागज पर लिखता हूं

कपिल जैन

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