#Kavita by Karan Bahadur Sahar

माथे पर तिलक और राखी इस कलाई पर बांधी है,

आज मेरी बहन ने एक गांठ मेरी तन्हाई पर बांधी है।

 

हमेशा साथ देने का वचन दिया है मैने भी,

जब उसने एक रेखा मेरी परछाई पर बांधी है।

 

बहुत ही ख़ूबसूरत एहसास रहते हैं मेरे दिल में,

जब से एक मासूमियत उसने मेरी अच्छाई पर बांधी है।

 

वो पहली है जिस के चले जाने में भी मेरी ख़ुशी है,

कुछ ऐसे लम्हों की बेड़ियाँ उसने अपनी विदाई पर बांधी है।

 

दो-दो परिवारों की दरों-दीवारों को सजाए रक्खा है,

सभी की मुहब्बत को बड़ी गहराई पर बांधी है।

 

भाइयों, हमें भी आज इन सब की रक्षा का प्रण  लेना चाहिए,

जिसने इस राखी के साथ कुछ उम्मीदें अपने भाई पर बांधी है।

 

करन “सहर”

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