#Kavita by Karan Bahadur Sahar

Happy Father’s Day

अपने कंधों पर बिठा सारी दुनिया की सैर कराते थे,

मेरे पिता मुझे जिंदगी को जीना सिखाते थे।

 

मैं जब भी साइकिल सीखता हुआ गिर जाता था,

ज़िंदगी गिर कर संभलना है, मेरे पिता बताते थे।

 

अक्सर मेरी गलतियों पे मुझे डांट देते पीट देते थे,

मग़र फिर प्यार से मुझे सही रास्ता दिखाते थे।

 

मैंने ख़ुद नहीं माँगे कोई मिठाई, खिलौने या कुछ भी,

क्युँकि मेरे पिता मुझे ख़ुद-ब-ख़ुद सब कुछ दिलाते थे।

 

आज मैं थोड़ा बड़ा हो गया हूँ इसलिए शायद,

अब मुझे उतना नहीं बुलाते जितना पहले बुलाते थे।

 

आज एक अलग कमरा मिल गया है मुझे सोने को,

अब अपनी छांव में नहीं सुलाते जैसे पहले सुलाते थे।

 

खैर ये दूरियां हैं या मजबूरियाँ मैं समझ नहीं पाया,

मैं भी उतना ही समझा हूँ, जितना पिता सिखाते थे।

 

करन “सहर”

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