#Kavita by Karan Sahar

छूट गया तू

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राह तेरी मैं, देख रहा हूँ

देख रहा हूँ कब से,

छूट गया तू जब से ।।

 

भीगी पलकें छुपती नहीं है

छुपती नहीं हैं, सब से,

छूट गया तू जब से ।।

 

तुझ को अब तक माँग रहा हूँ

माँग रहा हूँ, रब से,

छूट गया तू जब से ।।

 

नाम तेरा जाता ही नहीं हाए,

जाता ही नहीं मेरे लब से,

छूट गया तू जब से ।।

 

चाँद भी उखड़ा रहने लगा है

रहने लगा है शब से,

छूट गया तू जब से ।।

करन_सहर

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