#Kavita by Karan Sahar

बहुत सी कमियाँ हैं मुझ में

जिन्हें मैं सीने में ले कर चल रहा हूँ,

अपनी फितरत नहीं बदल पाया

इसलिए आईने बदल रहा हूँ ।।

 

ज़मीं को आसमाँ होते देखा है

आसमानों में अब चल रहा हूँ,

इतना आगे निकल तो गया

मगर पल पल मैं जल रहा हूँ ।।

 

कुदरती बातें नहीं जचतीं

अब मेरे हिस्से की ज़िंदगी को,

ऐसे मैं जम रहा हूँ,

कि जैसे पिघल रहा हूँ ।।

 

कोई शोहरत का मारा है

कोई दौलत का प्यारा है,

मैं चल भी पा रहा हूँ या

अपने ही घर में फिसल रहा हूँ ।।

 

हर सिम्त जो फूलों ने

मुझे इतना महकाया है

मेरी ऐसी मजाल है अब

इन्हीं फूलों को मसल रहा हूँ ।।

 

कभी हारा नहीं किसी से

न कुदरत से न खुदा से,

अपनी मौत को हरी झंडी देने में

मैं अक्सर सफल रहा हूँ ।।

 

इंसानियत इस कदर हार कर

बैठी तो है चोंकडी मार कर,

मगर अब मुझे मान जाना चाहिए

कि मैं गलत, हर पल रहा हूँ ।।

करन_सहर

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