#Kavita by Karan Sahar

!! मैं नहीं मानता !!

 

तुम्हारे अगर पाँव नहीं चलते

तो मैं भी तो लंगड़ा हूँ,

जो चलते फिरते पाँव से भी

महज़ कब्र तक का सफर नाप रहा हूँ ।।

 

तुम अगर देख नहीं सकते आँखों से

तो भी तुम मुझ से अच्छे हो,

अपने हर साज-ओ-सामान को

सलीके से पहचान तो लेते हो ।।

 

किसने कहा कि तुम्हारा जिस्म

मेरे जिस्म से कुछ कमतर है,

बल्कि तुम्हारे करतबों का पलड़ा

मेरी अपंग सोच से हमेशा भारी रहा है ।।

 

मैं नहीं मानता कि तुम विकलांग हो

हाँ, इतना ज़रूर हो सकता है,

कि ख़ुदा ने सबसे ताकतवर लोगों को

कुछ अलग बनाया हो कि वो दूर से पहचाने जा सकें ।।

 

#करन_सहर

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