#Kavita by Karan Sahar

जब तेरी आँखे नम हो जाएं

ये चाँद सितारे कम हो जाएं,

उम्मीदों की किरणें जब

जलते जलते मद्धम हो जाएं

तब और न कुछ कहना हमसे

बस खामोशी ही काफी है ।।

 

जब धरा लहू लुहान हो जाए,

हवा हिंदु-मुसलमान हो जाए,

दिल की छोटी छोटी तकरारें

जब बाहर निकलें और जवान हो जाएं

तब और न कुछ कहना हमसे

बस खामोशी ही काफी है ।।

 

जब साँसों में ज्वार बहे,

एक गूंगा सो सो बार कहे,

जब जुर्म को होते देख के भी

मौन जो ये संसार रहे,

तब और ना कुछ कहना हमसे

बस खामोशी ही काफी है ।।

 

जब पीड़ा दिल के अंदर हो

और आँखों में समंदर हो

जब मन मे लाखों सवाल हों

मन उलझा हुआ सिकंदर हो

तब और ना कुछ कहना हमसे

बस खामोशी ही काफी है ।।

 

जब चारों तरफ दरिंदगी हो

सब की नीयत में गंदगी हो

इंसानियत का बुरा हाल हो

और ख़तरे में ये जिंदगी हो

तब और ना कुछ कहना हमसे

बस खामोशी ही काफी है ।।

 

जब फूलों में खुशबू ना हो

जीने की भी आरज़ू ना हो

या मैं ना होऊं तेरी याद में

या मेरी याद में तू ना हो

तब और ना कुछ कहना हमसे

बस ख़ामोशी ही काफी है ।।

 

जब रंग सभी बेरंग हो जाएं

दिल की गलियां तंग हो जाएं

हम इंसानों का हाल देख कर

जब कुदरत भी ये दंग हो जाएं

तब और ना कुछ कहना हमसे

बस ख़ामोशी ही काफी है ।।

 

#करन_सहर

 

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