#Kavita by Karan Sahar

पाँव छिल जाते हैं
हाथ जल जाते हैं
इतनी जद्दोजहद के बाद भी
इन के नसीब में
रोटी से भरी थाली नहीं होती,
शायद
गरीबों की कभी दीवाली नहीं होती ।

गाड़ी-बंगले वाले लोग
ज़मीन पर पाँव रखने से कतराते हैं
और वो बेचारे लोग
सड़क किनारे ही सो जाते हैं,
इस इंसानियत के लिए
इस से बड़ी कोई गाली नहीं होती,
शायद
गरीबों की कभी दीवाली नहीं होती ।

दिन भर धूप में मज़दूरी
रात भर ठंड में ठिठुरने से भी,
कई दिन खाए बिना रह कर
हर रोज़ कई बार मरने से भी,
इन लोगों की नीयत काली नहीं होती
शायद
गरीबों की कभी दीवाली नहीं होती ।

#करन_सहर

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