#Kavita by Karan Sahar

बहूत आसानी से जी रहा हूँ !!

 

तुम सच ही कहती थी

कि इतना मुश्किल भी नहीं होगा

तुम्हारे बिना जी पाना

हिज़्र के घूँट पी पाना,

हाँ बहूत आसानी से जी रहा हूँ मैं ।

 

बस रोज़ सुबह जागने से पहले

तुम्हारे चेहरे का एक अक्स बना लेता हूँ

और उसी अक्स को पूरे दिन संभाल कर रखता हूँ

आँखों के किनारे में ।

 

कहीं तुम्हारा ये अक्स आँखों से उतर न जाए

इसलिए आज कल मैंने

इन आँखों से रोना भी छोड़ दिया है ।।

 

दिन भर मैं तुम्हारी आवाज़ों के

टुकड़े इकठ्ठे करता फिरता हूँ,

और रात को सोते वक्त

तुम्हारी आवाज़ों से गुफ्तगू करने लगता हूँ ।

 

तुम्हारी तस्वीरों को टटोल कर

रात भर उसे घूरता रहता हूँ

शायद शिकायत करता हूँ

अपने आप की तुम से ।।

 

दर्द तो आज कल

हर रोज़ ही रहता है सीने में

हाँ मगर शायद

बहूत आसानी से जी रहा हूँ मैं ।।

 

-सहर

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