#Kavita by Kavi Krishan Kant Dubey

“यह भीड़ तंत्र है”

 

भीड़ है

भीड़ को चलाने वाली

सरकार है,

सरकार के पास

ऊँची-ऊँची इमारतें हैं

और

उन इमारतों में शानदार सामान है,

सरकार की ऊँची कुर्सी है

ऊँची कुर्सी पर बैठे हुजूर हैं

चाँदी की थाली

सोने की कटोरी-चमच हैै

‘हुजूर’के खाने में हीरे,मोती हैं,

सब है/पर अगर कुछ नहीं है

तो वह है

भीड़ की बैचैनी

क्योंकि ऊँची कुर्सी पर बैठने वाला

अब जमींन की ओर कहाँ देखता

वह तो सिर्फ और सिर्फ आसमान की ओर देखता है.

 

गाँव की गलियों में भीड़ है

शहर की सड़कों पर भीड़ है

हर चौराहें/हर दफ्त्तर के सामने भीड़ है

बच्चें/बूढ़ें/जवान

मजदूर/किसान

पढ़ें-लिखे/बिना पढ़े-लिखे

सबकी भीड़ लगी है

कोई जिंदाबाद के नारे लगा रहा

तो कोई मुर्दाबाद-मुर्दाबाद चिल्ला रहा,

कोई अधिकार माँग रहा

तो कोई रोजगार माँग रहा

बात यहीं नहीं रुकती

कोई रोटी/कोई पानी

तो फिर कोई दो गज जमींन माँग रहा,

खूब मचा है

हाय-हल्ला

पर

ऐसी की ठंडक में मौज कर रहे हुजूर

मस्ती-मस्ती खेल रहे

बेफिक्र बैठे हुजूर को शायद नहीं पता है

भीड़ तंत्र का पावर.

 

यह भीड़ शान्त रहें तो मानवतावादी है

अगर भड़क गई तो दैत्यवादी है

यह भीड़ अगर कुर्सी देती है

तो फिर मिट्टी में भी मिला देती है

क्योंकि

यह भीड़ लोकतांत्रिक है

अपने अधिकारों के लिए

जमींन को आसमान पर

और

आसमान को जमींन पर

ला सकती है

इसलिए

सरकार चलाने वाले हुजूर

सभंल जाओ

होश में आ जाओ

भीड़ की भूख-प्यास

को समझ जाओ

वरना———

यह भीड़ तंत्र है|

*    *

डॉ.(कवि) कृष्ण कान्त दुबे

कन्नौज

मो.8004867937

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