#Kavita by Kavi Nilesh

 

लोग कहते हैं दुनिया  चलती है

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घुमती दुनिया शायद अब चलने लगी

कुछ लड़कीयां मुझे देखकर जलने लगी ।

पहले लड़कीयां मुंह छुपाए टकटकी लगाए बैठी रहती थी ।

चेहर पर घूंघट और चुपचाप सुनती रहती थी ।

अब तो घर में मेरी खैर नहीं है ।

पत्नी से अब भी मेरी बैर नहीं है ।

फिर भी अब बदलाव आया ।

मेरे जैसा पुरुष भी चुपचाप बेलन खाया है।

घर घर कि यही कहानी है

पुरुष को नारियों से मार खानी है

 

इससे साफ पता चलता है

 

पहले दुनिया घुमती थी ।

अब दुनिया चलती है ।

और तो और अधकटे वस्त्र कि और अधनंगी नारियों कि कहानी कहती है

दुनिया शायद दुनिया दिन दुनी रात चौगुनी चलती है ।

कवि निलेश

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