#Kavita by Kavi Santosh Kumar Preet

विषय- माता तेरे रूप अनेक

 

नवरात्र के नव दिन मईया

धरती है नव रूप ,

हर एक रूप में लगती है माँ

तेरी छवि अनूप,

करें हम सबका ही अभिषेक।

हे माता … तेरे रूप अनेक

हे माता … तेरे रूप अनेक।।

 

दुष्ठो का मर्दन करती है

सन्तन की हितकारी,

तू तो है जगजननी माता

जग तेरा आभारी,

देती बल बुद्धी और विवेक।

हे माता… तेरे रूप अनेक -2।।

 

तेरे दर पे भक्तो की माँ

होती भीड़ है भारी,

उन भक्तो में एक हूँ मै भी

सुध बुध तुझपे वारी,

कर दो ‘प्रीत’ हृदय को नेक।

हे माता… तेरे रूप अनेक-2।।

सन्तोष कुमार ‘प्रीत’

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