#Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

**वृक्ष की व्यथा*

 

मधुवन की बिखरी सी अमरैया.

सूनी सूनी सी अब मेरी है छैया..

ढूंढता रहता बहती दिशाओं में जीवन.

मधुरस है पर त्रषणा से भरा मेरा मन..

जर्जर जीर्ण सी लिए मैं काया.

बसंत ने भी देख मुझे चिड़ाया..

मोन हृदय ढूँढ रहा कहाँ गये वो बच्चे.

उधम मचाते खूब पर दिल के सच्चे..

उनके बिना मोन हृदय है उन्मन.

सूनी डाली पत्ते और मेरा मन..

कहाँ गये वो सावन झूले.

कहाँ है वो बौर फूले फूले..

मुसाफिर कहाँ जो लेटते सुस्ताते.

प्रीतम प्रेयसी बैठे घंटों थे बतियाते..

कभी पंचायत कभी स्कूल की कक्षालगती थीं .

तपता जब सूरज घर छोड़ आजाती थी बस्ती..

जाने कहाँ गये वो दिन मेरे अलबेले.

अब खड़ा रहता उदास सा मैं अकेले..

 

…………..””वकील””

 

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