#Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

****चुनावी यात्रा***

 

स्वर्ग जमीं पर लाने का वादा इनका चल जाएगा.

नतीजे आते ही संकल्प बर्फ बन पीघल जाएगा..

 

जनता बांचती रहेगी थोथे इनके सब हैं आखर.

बातों में लहर दिखा रहे बिना नदी बिना सागर..

 

चुनावी उत्सव के गूंज रहे हैं चहूं और हर्षगीत.

हँसने की कोशिश में आह बन निकल रही चीख..

 

मीठा सा मध्यम विष प्रजा पी पी जिये जा रही.

आशाओं की बगिया में सपनो के सुमन खिला रही..

 

वादों इरादों की हवा निरंतर भरी जा रही.

समझोतों के गुब्बारे पार्टियाँ फुलाये जा रही..

 

नजर आ रही रोज रोज नई नई कुटिलतायें.

आदमखोर व्याघ्र बेठे नित नई नई घात लगाये..

 

श्वेत बकुल सजधज बहलाते भोलीभाली प्रजा..

ज्वलन गंध उड़ा रहे इत्र फुलेल कपड़े पर लगा..

 

तोड़ना ही नहीं चाहता कोई भ्रमों का इंद्रजाल.

अपनी सुविधा के अनुसार होते राजा वाचाल..

***””वकील””*!

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