#Kavita by Kavi Sharad Ajmera Vakil

उन्मत्त हृदय की धड़कन को.

साँसो की बढ़ती थिरकन को.

भावुक कवि के पागलपन को.

प्रीतरंग में रंगे मेरे मन को.

कोई क्या जाने कोई क्या समझे..

 

रग रग में दोड़ती प्रीत को.

नयन खोजते मन के मीत को.

मन से मन के मिलन को.

उर के मूक निमंत्रण को.

कोई क्या जाने कोई क्या समझे.

 

साँसें भी है थमने को.

जीवन रथ है रूकने को.

उर के इस कंपन को.

स्व के आत्म विसर्जन को.

कोई क्या जाने कोई क्या समझे.

 

उर में मिलन की पिपासा.

मन में बड़ रही मिलन की आशा.

अलि की प्रीत पगी गुंजन को.

प्यासे से मेरे अंतरमन को.

कोई क्या जाने कोई क्या समझे..

 

विकल व्यथा बनी हमजोली.

अरमानो की जल रही है होली.

मन को झुलसाती इस तपन को.

सुलगती विरह की अगन को

कोई क्या जाने कोई क्या समझे..

कवि शरद अजमेरा “”वकील””

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